दलितों को मंदिर का पुजारी बनाने पर विप्र और पुजारी समाज में आक्रोश

प्रधानमंत्री को भेजे ज्ञापन में केरल सरकार के फैसले को रद्द करने मांग

फैसला रद्द न करने की सूरत में आंदोलन करेगी मध्यप्रदेश की परशुराम सेना

येदु कृष्णन, केरल का प्रथम दलित पुजारी

केरल (JT NEWS TEAM), 12 अक्टूबर:– केरल सरकार और त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने आरक्षण के आधार पर मंदिरो में चली आ रही परम्पराओं को तोड़कर पुजारियों की जो नई नियुक्तियां की गयी है। परशुराम सेना, जिला राजगढ़, मध्यप्रदेश उसके विरोध में उतर आयी है। प्रधानमंत्री के नाम, नायब तहसीलदार, ठपा कार्यालय, माचलपुर को 11 अक्टूबर को सौंपे गए ज्ञापन में परशुराम सेना द्वारा उपरोक्त नियुक्तियों को रद्द करने की मांग की है। उनके अनुसार केरल सरकार और त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने परम्पराओं को तोड़कर पुजारियों की जो नई नियुक्तियां की है, उनसे विप्र समाज और पुजारी समाज आहत होने बात उन्होंने कही है।
परशुराम सेना के प्रदेश अध्यक्ष प.देवकरण शर्मा से जब हमारे सहयोगी अखबार रुमीपोस्ट ने फ़ोन पर बात की तो उन्होंने उपरोक्त ज्ञापन देने की बात को माना और कहा कि विप्र समाज और पुजारी समाज में उपरोक्त फैसले से रोष में है और उन्हें बेरोजगार और कमजोर करने की कोशिश की गयी है। सरकार द्वारा फैसला रद्द न किये जाने की सूरत में उग्र प्रदर्शन की चेतावनी भी दी है।


गौरतलब है कि भारत के दक्षिणी राज्य केरल में सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए छह दलितों को आधिकारिक तौर पर त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड का पुजारी नियुक्त किया गया है, जिन्होंने कई वर्षो तक वैदिक ज्ञान का प्रशिक्षण लिया है ।

जब हमारे सहयोगी अखबार रुमीपोस्ट ने परशुराम सेना के अध्यक्ष प.देवकरण शर्मा से कहा कि भारत एक लोकतंत्र देश है और अगर कोई व्यक्ति (दलित) अपनी क़ाबलियत के दम पर पुजारी बन सकता है तो किसी को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए तो उन्होंने कहा कि मंदिरों में पूजा का अधिकार केवल ब्राह्मणो का है और रहना चाहिए अन्यथा फैसला रद्द न होने पर हम उग्र प्रदर्शन भी कर सकते है।

अब सोचने वाली बात है कि जब मनुस्मृति का दहन कर बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म में सदियों से चली आ रही जातिप्रथा को समाप्त करने की बात की थी और जब भारत देश बाबा साहेब डा. अम्बेडकर द्वारा रचित संविधान पर चल रहा हो, जिसमे सभी लोगो को बराबरी का दर्जा दिया गया है चाहे वो किसी धर्म से सम्बन्ध रखता हो तब ब्राह्मण समाज को 100 % मंदिरो में पुजारी बनने का आरक्षण कहा तक सही है। अगर किसी दलित को पुजारी बनाने पर, ब्राह्मण समाज में इतना आक्रोश है तो इस स्थिति में दलित समाज आने वाले समय में क्या विचारधारा अपनाएगा और केंद्र व् राज्य सरकार का रुख क्या रहेगा ? ये देखने वाली बात होगी क्यूंकि परशुराम सेना, मध्यप्रदेश द्वारा दलितों का पुजारी बनने पर विरोध करना, हर तरफ से जातिवाद को बढ़ावा देता है जोकि भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में नहीं होना चाहिए।

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